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नव-स्वदेशी

भारत की $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था के लिए आत्मनिर्भरता की नई परिभाषा

प्रस्तावना: एक राष्ट्रीय लोकाचार का विकास

‘स्वदेशी’ की अवधारणा भारतीय चेतना में पवित्र स्थान रखती है। ऐतिहासिक रूप से यह 20वीं सदी की शुरुआत में राजनीतिक प्रतिरोध का एक सशक्त साधन बनकर उभरी, एक ऐसा दर्शन जो औपनिवेशिक शासन की आर्थिक मशीनरी को पंगु करने की आवश्यकता से जन्मा।

जैसे-जैसे भारत $5 ट्रिलियन अर्थव्यवस्था और 2047 तक विकसित भारत की ओर बढ़ रहा है, स्वदेशी की परिभाषा में गहरा बदलाव आ रहा है। हम ‘बहिष्कार’ के दौर से निकलकर ‘निर्माण’ के दौर में पहुँच चुके हैं।

यह ‘नव-स्वदेशी’ आंदोलन अलगाववाद की ओर वापसी नहीं है। इसके बजाय, यह भारत को वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एक प्रमुख और आत्मनिर्भर खिलाड़ी के रूप में एकीकृत करने की एक परिष्कृत आर्थिक रणनीति है।

‘मेक इन इंडिया’ और ‘वोकल फॉर लोकल’ के माध्यम से स्वदेशी को पुनर्जीवित किया गया है, जो राष्ट्र को उपभोग-आधारित विकास से उत्पादन-आधारित संप्रभुता की ओर ले जा रहा है।

नव-स्वदेशी का दर्शन: चार मुख्य स्तंभ

नव-स्वदेशी एक व्यावहारिक, विकासोन्मुख ढाँचा है जो राष्ट्रीय पहचान को आर्थिक प्रतिस्पर्धा से जोड़ता है।

तकनीकी संप्रभुता

डिजिटल युग में आत्मनिर्भरता डेटा और कोड तक फैली है। विदेशी तकनीकी प्रणालियों पर निर्भरता कम करके भारत यह सुनिश्चित करता है कि उसका डिजिटल ढांचा भू-राजनीतिक उतार-चढ़ाव के खिलाफ सुरक्षित रहे।

स्थिरता और स्थानीय संसाधन

खादी और जैविक कृषि को बढ़ावा देना, जो आर्थिक विकास को स्थायी प्रथाओं के साथ जोड़ता है। ‘स्थानीय’ शब्द ‘स्थायी’ का पर्याय बन जाता है।

वोकल फॉर लोकल से वोकल फॉर ग्लोबल

इसका लक्ष्य ‘वोकल फॉर ग्लोबल’ है, यानी स्थानीय ब्रांडों को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध बनाना।

आर्थिक आधारशिला: MSME परिदृश्य

इस आर्थिक पुनर्जागरण के केंद्र में MSME क्षेत्र है, जो आत्मनिर्भर भारत को जमीनी आर्थिक हकीकत में बदलने का मुख्य माध्यम है।

आँकड़े स्वदेशी व्यापारी मंच द्वारा प्रकाशित अनुसार हैं; उद्धृत करने से पहले आधिकारिक स्रोतों से जाँच लें।

आर्थिक प्रभाव का आकलन

MSME भारत की GDP में लगभग 30% और कुल विनिर्माण उत्पादन में 36% का योगदान देते हैं। यह क्षेत्र केवल अर्थव्यवस्था में योगदान नहीं देता, कई मायनों में यही अर्थव्यवस्था है।

स्वदेशी की मानवीय पूंजी

MSME क्षेत्र लगभग 11–12 करोड़ लोगों को रोजगार देता है और कृषि के बाद दूसरा सबसे बड़ा नियोक्ता है। कम पूंजी में MSME कहीं अधिक रोजगार पैदा करते हैं।

समावेशी विकास और धन का लोकतंत्रीकरण

50% से अधिक MSME ग्रामीण भारत में हैं, जिससे शहरी पलायन घटता है। लगभग 66% के स्वामी SC/ST/OBC समुदायों से हैं। ‘महिला कॉयर योजना’ और PMEGP जैसी योजनाएँ 2030 तक 30% महिला-नेतृत्व वाले उद्यमों का लक्ष्य रखती हैं।

उपभोग पैटर्न में बदलाव

नव-स्वदेशी जितना आर्थिक है उतना ही मनोवैज्ञानिक आंदोलन भी है, जिसमें उपभोक्ता अब राजनीतिक बहिष्कार से नहीं, गुणवत्ता और गर्व से स्थानीय उत्पाद चुनते हैं।

वेलनेस और जीवनशैली

उपभोक्ता खादी और हथकरघा जैसे पारंपरिक, पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों के माध्यम से अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जुड़ रहे हैं।

डिजिटल स्वदेशी

UPI की सफलता से लेकर ‘जोहो’ जैसी सॉफ्टवेयर कंपनियों के उदय तक, ‘डिजिटल स्वदेशी’ आंदोलन पूरी तरह सक्रिय है।

संरचनात्मक सुधार: ‘बौनेपन’ से ‘वैश्विक दिग्गजों’ तक

दशकों तक भारतीय MSME ‘बौनेपन’ से जूझते रहे: ऐसी फर्में जो अपनी पसंद से नहीं, बल्कि नियामक बाधाओं, संसाधनों की कमी और सीमित बाजार पहुँच के कारण छोटी रहीं। नव-स्वदेशी इन बाधाओं को सीधे संबोधित करता है।

डिजिटल सार्वजनिक बुनियादी ढांचा

जैसे UPI ने भुगतान को सबके लिए सुलभ बनाया, वैसे ही ONDC ई-कॉमर्स को लोकतांत्रिक बना रहा है। GeM सार्वजनिक खरीद में MSME की हिस्सेदारी सुनिश्चित करता है।

ऋण की समस्या का समाधान

उद्यम पंजीकरण पोर्टल ने लाखों अनौपचारिक उद्यमों को औपचारिक दायरे में लाया है। RAMP योजना केवल ऋण पर नहीं, बल्कि प्रदर्शन-आधारित सहायता पर केंद्रित है।

गुणवत्ता ही नई मुद्रा है

ZED (जीरो डिफेक्ट, जीरो इफेक्ट) प्रमाणन MSME को विश्वस्तरीय और पर्यावरण-अनुकूल उत्पाद बनाने के लिए प्रेरित करता है।

वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में एकीकरण

PLI योजनाएँ बड़े निर्माताओं को स्थानीय MSME से पुर्जे लेने के लिए प्रोत्साहित करती हैं। यह ‘हब एंड स्पोक’ मॉडल छोटी भारतीय फर्मों को वैश्विक उद्योगों की अनिवार्य सहायक इकाइयाँ बनाता है।

आगे की राह: एक समन्वित राष्ट्रीय प्रयास

  1. सरकारी निरंतरता

    व्यापार करने की आसानी में सुधार जारी रहे और ‘इंस्पेक्टर राज’ को डिजिटल पारदर्शिता से बदल दिया जाए।

  2. कॉर्पोरेट तालमेल

    बड़े भारतीय कॉर्पोरेट्स को MSME को रणनीतिक दीर्घकालिक भागीदारों के रूप में देखना चाहिए।

  3. उपभोक्ता चेतना

    हर ‘मेड इन इंडिया’ उत्पाद की खरीद राष्ट्र की संप्रभुता में एक सीधा निवेश है।

निष्कर्ष: एक आत्मनिर्भर भविष्य की अनिवार्यता

नव-स्वदेशी आंदोलन की सफलता इस बात से नहीं मापी जाएगी कि हमने कितने उत्पादों का आयात बंद किया, बल्कि इस बात से मापी जाएगी कि दुनिया भारत के कितने उत्पादों के बिना नहीं रह सकती।

स्रोत: स्वदेशी व्यापारी मंच (swadeshivyaparimanch.com)।